कैंसर

कैंसर एक जटिल बीमारी है जो तब होती है जब शरीर की कोशिकाएं असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं और नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं। हमारा शरीर अरबों कोशिकाओं से बना है जो सामान्य रूप से बढ़ती हैं, विभाजित होती हैं और मर जाती हैं। यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया है जो शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करती है।

कैंसर कैसे शुरू होता है?

कैंसर तब शुरू होता है जब कोशिकाओं में आनुवंशिक परिवर्तन (genetic mutations) होते हैं। ये परिवर्तन कोशिकाओं को सामान्य रूप से काम करने से रोकते हैं। इसके बजाय, वे:

  • असामान्य रूप से बढ़ती हैं: वे सामान्य कोशिकाओं की तरह बढ़ना बंद नहीं करतीं, बल्कि लगातार बढ़ती रहती हैं।
  • नियंत्रण से बाहर विभाजित होती हैं: वे लगातार नई कोशिकाएं बनाती हैं, भले ही शरीर को उनकी ज़रूरत न हो।
  • मरती नहीं हैं: सामान्य कोशिकाएं एक निश्चित समय के बाद मर जाती हैं, लेकिन कैंसर कोशिकाएं मरती नहीं, बल्कि जमा होती रहती हैं।

इन असामान्य कोशिकाओं का जमावड़ा ट्यूमर (tumor) बनाता है, जो गांठ या द्रव्यमान के रूप में हो सकता है। सभी ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होते हैं।

  • सौम्य ट्यूमर (Benign tumors): ये कैंसरयुक्त नहीं होते। ये आसपास के ऊतकों में नहीं फैलते और न ही शरीर के अन्य हिस्सों में जाते हैं। इन्हें आमतौर पर हटाया जा सकता है और वे वापस नहीं आते।
  • घातक ट्यूमर (Malignant tumors): ये कैंसरयुक्त होते हैं। ये आसपास के ऊतकों पर आक्रमण कर सकते हैं और शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकते हैं। इस प्रक्रिया को मेटास्टेसिस (metastasis) कहते हैं। जब कैंसर मेटास्टेसाइज करता है, तो यह मूल ट्यूमर से दूर नए ट्यूमर बनाता है।

कैंसर के कारण

कैंसर के कई कारण हो सकते हैं, और अक्सर यह कई कारकों के संयोजन से होता है। कुछ मुख्य कारण इस प्रकार हैं:

  • जीवनशैली और व्यवहारिक कारक:
    • धूम्रपान और तंबाकू का सेवन: यह फेफड़े, मुंह, गले, अन्नप्रणाली (esophagus), मूत्राशय (bladder) और कई अन्य प्रकार के कैंसर का सबसे बड़ा कारण है।
    • शराब का अत्यधिक सेवन: मुंह, गले, अन्नप्रणाली, यकृत (liver) और स्तन कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है।
    • अस्वास्थ्यकर आहार: कम फल-सब्जियां, अधिक प्रसंस्कृत भोजन (processed foods) और लाल मांस का सेवन कुछ कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकता है।
    • शारीरिक निष्क्रियता और मोटापा: मोटापा कई प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है, जैसे स्तन, पेट का कैंसर, गुर्दे और अग्न्याशय (pancreas) का कैंसर।
    • सूर्य के प्रकाश का अत्यधिक संपर्क: त्वचा कैंसर (विशेषकर मेनोमा) का मुख्य कारण है।
  • पर्यावरणीय कारक:
    • प्रदूषण: वायु प्रदूषण, औद्योगिक रसायन और कुछ कीटनाशक कैंसर का कारण बन सकते हैं।
    • विकिरण (Radiation): एक्स-रे और गामा किरणों जैसे आयनीकृत विकिरण के संपर्क में आने से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।
    • एस्बेस्टस (Asbestos) और रेडॉन (Radon) जैसे पदार्थ: कुछ व्यावसायिक एक्सपोजर कैंसर का कारण बन सकते हैं।
  • आनुवंशिक कारक (Genetic Factors):
    • कुछ लोगों में जन्म से ही कुछ जीन में परिवर्तन होते हैं जो उन्हें कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील बनाते हैं। उदाहरण के लिए, BRCA1 और BRCA2 जीन में परिवर्तन स्तन और डिम्बग्रंथि (ovarian) के कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं।
  • संक्रमण (Infections):
    • कुछ वायरस और बैक्टीरिया कैंसर का कारण बन सकते हैं:
      • ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV): गर्भाशय ग्रीवा (cervical), गुदा (anal) और कुछ प्रकार के मुंह और गले के कैंसर का कारण बनता है।
      • हेपेटाइटिस बी और सी वायरस: यकृत कैंसर का कारण बनते हैं।
      • हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (H. pylori): पेट के कैंसर का कारण बन सकता है।
      • एपस्टीन-बार वायरस (EBV): कुछ लिंफोमा (lymphoma) और नासोफेरिंजियल कैंसर से जुड़ा है।
  • उम्र (Age):
    • कैंसर का जोखिम उम्र के साथ बढ़ता जाता है क्योंकि कोशिकाओं को अधिक समय तक उत्परिवर्तन (mutations) जमा करने का मौका मिलता है।
  • पुरानी सूजन (Chronic Inflammation):
    • शरीर में लगातार या पुरानी सूजन कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकती है, जैसे क्रोहन रोग (Crohn's disease) में कोलन कैंसर।

संक्षेप में, कैंसर एक जटिल बीमारी है जो कोशिकाओं में आनुवंशिक परिवर्तनों के कारण होती है, जिससे वे अनियंत्रित रूप से बढ़ती हैं और विभाजित होती हैं। इन परिवर्तनों को कई कारक प्रभावित कर सकते हैं, जिनमें जीवनशैली, पर्यावरणीय कारक, आनुवंशिकी और संक्रमण शामिल हैं।                                                                                                                        

                कैंसर पैदा करने वाले कारक(Carcinogens)   

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की अंतर्राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) कैंसर पैदा करने वाले पदार्थों या परिस्थितियों को 'कार्सिनोजन' के रूप में वर्गीकृत करती है। IARC इन कार्सिनोजन को चार समूहों में बांटता है, जो इस बात पर आधारित होते हैं कि उनके कैंसर पैदा करने के कितने मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध हैं।

आइए इन समूहों और कुछ महत्वपूर्ण कार्सिनोजेन पर गहराई से नज़र डालें:

IARC द्वारा कार्सिनोजन का वर्गीकरण (Classification of Carcinogens by IARC)

IARC वैज्ञानिक अध्ययनों की समीक्षा करता है और फिर पदार्थों/स्थितियों को निम्नलिखित समूहों में वर्गीकृत करता है:

  1. समूह 1 (Group 1): मनुष्यों के लिए कैंसरकारी (Carcinogenic to humans)
    • इस समूह में वे कारक शामिल हैं जिनके बारे में मनुष्यों में कैंसर पैदा करने के लिए पर्याप्त प्रमाण हैं। इसका मतलब है कि यह साबित हो चुका है कि ये कैंसर का कारण बन सकते हैं।
    • उदाहरण:
      • तंबाकू और धूम्रपान: इसमें सक्रिय धूम्रपान (active smoking) और निष्क्रिय धूम्रपान (passive smoking) दोनों शामिल हैं। यह फेफड़े, मुंह, गले, अन्नप्रणाली, अग्न्याशय, मूत्राशय, गुर्दे, गर्भाशय ग्रीवा और कई अन्य प्रकार के कैंसर का प्रमुख कारण है।
      • शराब (Alcoholic beverages): मुंह, गले, अन्नप्रणाली, यकृत, स्तन और कोलोरेक्टल कैंसर सहित कई कैंसर से जुड़ी है।
      • एस्बेस्टस (Asbestos): फेफड़ों का कैंसर और मेसोथेलियोमा (mesothelioma) का एक मुख्य कारण।
      • आयनीकृत विकिरण (Ionizing radiation): एक्स-रे, गामा किरणें और अन्य प्रकार के विकिरण जो डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। यह ल्यूकेमिया (leukemia), थायराइड कैंसर, स्तन कैंसर आदि का कारण बन सकता है।
      • कुछ वायरस और बैक्टीरिया:
        • हेपेटाइटिस बी और सी वायरस (Hepatitis B and C viruses): यकृत कैंसर (liver cancer)।
        • ह्यूमन पैपिलोमावायरस (HPV): विशेष रूप से उच्च जोखिम वाले प्रकार, गर्भाशय ग्रीवा (cervical), गुदा (anal), और कुछ मुंह और गले के कैंसर का कारण बनते हैं।
        • हेलिकोबैक्टर पाइलोरी (Helicobacter pylori): पेट के कैंसर का कारण बनता है।
      • प्रसंस्कृत मांस (Processed meat): सॉसेज, हॉट डॉग, बेकन, हैम, डिब्बाबंद मांस आदि। IARC ने इन्हें कोलोरेक्टल कैंसर के लिए समूह 1 में सूचीबद्ध किया है।
      • बेंजीन (Benzene): ल्यूकेमिया से जुड़ा है।
      • इथिलीन ऑक्साइड (Ethylene oxide): एक रंगहीन गैस जिसका उपयोग कीटनाशक और स्टरलाइज़िंग एजेंट के रूप में किया जाता है, लिंफोमा और ल्यूकेमिया का खतरा बढ़ा सकती है।
      • नाइटशेड परिवार की सब्जियां (Nightshade vegetables): जैसे आलू, टमाटर, बैंगन (इनमें सोलानिन होता है, जो कुछ अध्ययनों में कैंसर से जुड़ा है, लेकिन यह एक विवादास्पद श्रेणी है और अधिकांश विशेषज्ञ इसे पूरी तरह से हानिकारक नहीं मानते हैं जब तक कि बहुत अधिक मात्रा में सेवन न किया जाए)।
  1. समूह 2ए (Group 2A): मनुष्यों के लिए संभवतः कैंसरकारी (Probably carcinogenic to humans)
    • इस समूह में वे कारक शामिल हैं जिनके बारे में मनुष्यों में कैंसर पैदा करने के लिए सीमित प्रमाण हैं, लेकिन जानवरों में कैंसर पैदा करने के पर्याप्त प्रमाण हैं।
    • उदाहरण:
      • लाल मांस (Red meat): जैसे बीफ, पोर्क, भेड़ का मांस। इसे कोलोरेक्टल कैंसर के लिए संभावित कैंसरकारी माना गया है।
      • शिफ्ट वर्क (Shift work) जिससे सर्कैडियन रिदम में बाधा आती है: स्तन कैंसर से जुड़ा पाया गया है।
      • गर्म पेय पदार्थ (Very hot beverages): जैसे 65°C से अधिक गर्म चाय या कॉफी, अन्नप्रणाली के कैंसर के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।
      • ग्लाइफोसेट (Glyphosate): एक व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाने वाला खरपतवार नाशक।
  1. समूह 2बी (Group 2B): मनुष्यों के लिए संभवतः कैंसरकारी (Possibly carcinogenic to humans)
    • इस समूह में वे कारक शामिल हैं जिनके बारे में मनुष्यों में कैंसर पैदा करने के लिए सीमित प्रमाण हैं, और जानवरों में कैंसर पैदा करने के लिए पर्याप्त से कम प्रमाण हैं। या यह कह सकते हैं कि ऐसे मजबूत प्रमाण नहीं हैं जो इसे कैंसरकारी सिद्ध कर सकें, लेकिन संदेह बना हुआ है।
    • उदाहरण:
      • एस्पार्टेम (Aspartame): एक कृत्रिम स्वीटनर, जिसे हाल ही में IARC ने इस श्रेणी में रखा है।
      • मोबाइल फोन से निकलने वाला रेडियोफ्रीक्वेंसी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (Radiofrequency electromagnetic fields from mobile phones): ब्रेन ट्यूमर के साथ संभावित संबंध।
      • एलोवेरा (पूरे पत्ते का अर्क): कुछ पशु अध्ययनों में कार्सिनोजेनिक प्रभाव पाए गए हैं।
      • कॉफी (Coffee): पहले इसे 2B में रखा गया था, लेकिन अब इसे समूह 3 में स्थानांतरित कर दिया गया है क्योंकि शोध से पता चला है कि यह कैंसर के जोखिम को कम भी कर सकती है।
  1. समूह 3 (Group 3): मनुष्यों के लिए कैंसरकारी के रूप में वर्गीकृत नहीं (Not classifiable as to its carcinogenicity to humans)
    • इस समूह में वे कारक शामिल हैं जिनके बारे में मनुष्यों में कैंसर पैदा करने के लिए अपर्याप्त प्रमाण हैं। इसका मतलब है कि यह कहने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वे कैंसर का कारण बनते हैं।
    • उदाहरण:
      • कॉफी (Coffee): अब इस श्रेणी में है।
      • कोलॉइडल सिल्वर (Colloidal silver): एक वैकल्पिक चिकित्सा उत्पाद।

 

कार्सिनोजन और भारत के संदर्भ में विशेष विचार

भारत में कैंसर के बढ़ते मामलों के साथ, कार्सिनोजन के बारे में जागरूकता और उनसे बचाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

  • तंबाकू और शराब: भारत में कैंसर के सबसे बड़े कारणों में से हैं। मुंह, गले और फेफड़ों के कैंसर के लिए ये प्रमुख जोखिम कारक हैं।
  • प्रदूषण: वायु प्रदूषण, विशेषकर शहरों में, फेफड़ों के कैंसर सहित कई कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है।
  • संक्रमण: हेपेटाइटिस बी और सी, एचपीवी जैसे संक्रमण भारत में कैंसर का एक महत्वपूर्ण कारण हैं, खासकर ग्रामीण और निम्न-आय वाले क्षेत्रों में। टीकाकरण और जागरूकता महत्वपूर्ण है।
  • आहार: प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन और पारंपरिक, स्वस्थ आहार से दूरी भी एक चिंता का विषय है।
  • व्यावसायिक जोखिम: कुछ उद्योगों में श्रमिकों को एस्बेस्टस, बेंजीन जैसे कार्सिनोजन के संपर्क में आने का खतरा होता है।

महत्वपूर्ण बिंदु:

  • जोखिम बनाम निश्चितता: IARC की वर्गीकरण प्रणाली का मतलब यह नहीं है कि समूह 1 में सूचीबद्ध हर व्यक्ति को कैंसर होगा, या समूह 3 में सूचीबद्ध कोई भी पदार्थ बिल्कुल सुरक्षित है। यह सिर्फ जोखिम और वैज्ञानिक प्रमाण के स्तर को दर्शाता है।
  • खुराक और अवधि: कार्सिनोजन के संपर्क की मात्रा और अवधि भी कैंसर के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • व्यक्तिगत संवेदनशीलता: हर व्यक्ति की आनुवंशिकी और प्रतिरक्षा प्रणाली अलग होती है, जो कार्सिनोजन के प्रति उनकी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
  • बचाव: कार्सिनोजन के संपर्क को कम करके कैंसर के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इसमें धूम्रपान छोड़ना, शराब का सेवन सीमित करना, स्वस्थ आहार लेना, नियमित व्यायाम करना, धूप से बचाव और उचित टीकाकरण शामिल हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और IARC का काम हमें उन खतरों के बारे में शिक्षित करना है जो कैंसर का कारण बन सकते हैं, ताकि हम सूचित विकल्प चुन सकें और अपने स्वास्थ्य की रक्षा कर सकें।

 

PAP Test

यह साधारण टेस्ट है लेकिन सरवाईकल कैंसर के परीक्षण के लिए बहुत ही उपयोगी एवं सरल जाँच है  | इसको करने के लिए डॉक्टर या तकनीशियन स्पेकुलम नामक यंत्र द्वारा बच्चेदानी के मुख से कुछ कोशिकाओं को लेकर एक स्लाइड पर फैलाकर माइक्रोस्कोप से उसका परीक्षण किया जाता है | इससे कैंसर की पूर्व अवस्था या सर्विक्स में संक्रमण का पता लगाया जा सकता है |

किसको कराना चाहिए ?
अन्तर्राष्ट्रीय  मानक के अनुसार आपकी उम्र 30 वर्ष से 65 वर्ष है तो आपको हर 3 साल में एक बार पैप टेस्ट कराना चाहिए |

किसको जरुरत नहीं है ?
जिस महिला की उम्र 65 वर्ष से अधिक या 21 वर्ष से कम है या किसी कारण से उसकी बच्चेदानी सर्विक्स सहित निकाल दी गयी हो |

कराने का सही समय -
मासिक धर्म से 10-20 दिनों के बीच

तैयारी (48 घंटे पूर्व से) -
1. सम्भोग नहीं करना है |
2. योनी की सफाई नहीं करनी है |
3. कोई दवा नहीं डालनी है |
4. गर्भ निरोधक क्रीम या जेली का प्रयोग नहीं करना है |